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अरुणाचल

संसार का आध्यात्मिक केन्द्र

भारत के प्रत्येक आध्यात्मिक केन्द्र की अपनी विशेषता तथा अपनी परम्परा है| इन सबमें तिरुवण्णामलै (अरुणाचल) सबसे सीधे मार्ग, निराकार एवं न्यूनतम  कर्मकाण्ड के मार्ग का  प्रतिनिधित्व करता है ।  यह  पथ है – आत्म – विचार का| तमिल में पुरानी कहावत है कि चिदम्बरमको देखने से, तिरुवारूर में जन्म लेने से, बनारस में मरने से मुक्ति मिल जाती है किन्तु अरुणाचल के बारे में सोचने मात्र से मुक्ति निश्चित हो जाती है| केवल सोचने मात्र से, क्योंकि सीधे मार्ग में शरीर का सम्पर्क होना आवश्यक नहीं है| इसलिए यदि महर्षि ने तिरुवण्णामलै एवं उसके पावन अरुणाचल पर्वत को अपना घर बनाया तो उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है|

१६ वर्ष की किशोर आयु में महर्षि ने मृत्यु के अनुभव मे सहज आत्म-विचार द्वारा आत्म-  ज्ञान की प्राप्ति के बाद घर छोड़कर‌ अरुणाचल में एक साधु का जीवन अपनाया तथा वहँ वे अपने जीवन पर्यन्त रहे| उनकी महासमाधि के समय एक चमकीले तारे का आकाश में भ्रमण करते हुए तथा पवित्र पर्वत अरुणाचल के शिखर पर विलीन होते देखा गया | यह अरुणाचल के प्रति उनके न केवल समर्पण का प्रतीक था बल्कि उसके साथ उनकी एकरूपता का संकेत भी था| उन्होंने अपनी रचनाओं, कथनों तथा स्वयं के जीवन द्वारा अरुणाचल को एक आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में महत्व दिया | महर्षि अरुणाचल को संसार का आध्यात्मिक केन्द्र कहते थे| अरुण का अर्थ लाल या अग्नि जैसा तेजस्वी है किन्तु यह केवल ताप देने वाला अग्नि नहीं है बल्कि यह ज्ञानाग्नि है या प्रज्ञाग्नि है जो न तो गरम है और न ही ठंडा | अरुणाचल का गुह्य अर्थ है – ज्ञान का पर्वत | मध्य स्तर के कस्बे के रूप में तिरुवण्णामलै अरुणाचल के तलहटी पर स्थित है| यह  चेन्नै से दक्षिण – पश्चिम में १२० मील दूर एक विशाल एवं भव्य मंदिर के साथ स्थित प्राचीन नगर है| वार्षिक उत्सवों में यहाँ पूरे दक्षिण भारत से यात्रियों की भीड़ उमड़ती है| विशेषकर नवम्बर में पड़ने वाले कार्तिकै दीपम के समय यह देखा जा सकता है| इस अवसर पर पर्वत के शिखर पर सन्ध्या को घी की ज्योति जलायी जाती है| उसके अतिरिक्त आश्रम में, महर्षि की जयन्ती एवं महासमाधि (आराधना) दिन जो क्रमश: सर्दी एवं वसन्त के अवसर पर पड़ते है, सबसे बडे उत्सव हैं|

आध्यात्मिक पथ में सबसे सीधे एवं सहज रूप से संबद्ध होने के बावजूद भारत के तीर्थों में तिरुवण्णामलै अधिक प्रख्यात नहीं है क्योंकि सीधा पथ कभी भी अधिक प्रख्यात नहीं हो सकता| यह अन्य पथों से अधिक कठिन है| संभवत: इसीलिए अधिकांश की तुलना में कुछ परिपक्वों के लिए है| निश्चित ही आत्म विचार की   पद्धति कुछ सदियों से प्रयोग से बाहर हो चुकी थी | यह महर्षि थे जिसने इसे पुनर्जीवित किया। उसे सीधा, सरल एवं सार्वभौम बनाया | अपने अनुग्रह एवं मार्गदर्शन से उसे मुमुक्षुओं के किए सुलभ किया |

पर्वत के उद्गम की एक पौराणिक कहानी है | एक बार ब्रह्मा एवं विष्णु में विवाद छिड़ा कि उनमें कौन बड़ा है| इस झगड़े से धरती की सन्तुलन व्यवस्था डगमगा गयी; इसलिए देवताओं ने शिव से गुहार की एवं विवाद को सुलझाने की प्रार्थना की| तब शिव ने अपने आपको एक प्रकाश-स्तम्भ  के रूप में प्रकट किया जिससे एक दिव्य आकाशवाणी हुई जिसने घोषणा की कि जो भी इस स्तम्भ का उपर या नीचला छोर सर्वप्रथम मालूम करेगा, वह बड़ा होगा | विष्णु ने एक सूअर का रूप धारण किया तथा छोर मालूम करने के लिए पृथ्वी में छेद करते हुए नीचे चले, जबकि ब्रहमा ने एक हंस का रूप धारण किया तथा छोर मालुम करने उपर आकाश में उड़े | विष्णु ज्योति स्तम्भ के छोर पर पहुँचने में असफल रहे किन्तु उन्होंने स्वयं के भीतर दिव्य प्रकाश देखना आरम्भ किया जो सभी हृदयों में प्रकाशित है | ध्यान में वह अपनी सुध-बुध भूल गये, उनहें अपने भौतिक शरीर का बोध नहीं रहा | ब्रह्मा ने आकाश से एलू पौधे का फूल गिरते देखा भ्रमवश उसे छोर मानकर सोचा कि वह बिजयी हो गये | उस फूल के साथ जो उन्हे क्षितिज से मिला था, के साथ वह वापिस लौटे |

विष्णु ने अपनी असफलता स्वीकार की तथा वापिस लौटे तथा ईश्वर की अनुशंसा एवं प्रार्थना की कि आप आत्मज्ञान है| आप ओम है | आप सभी चीजों के आरंभ, मध्य एवं अन्त है । आप सब कुछ हैं तथा सभी चीजों को प्रकाशित करते हैं | उन्हें देखकर ब्रह्मा शर्मिन्दा हुए तथा अपनी गल्ती स्वीकार कर ली|

कथा में विष्णु मन का तथा ब्रहमा बुध्दि का तथा शिव आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं |

कहानी में आगे है कि लिंग या ज्योति स्तम्भ इतना तेजस्वी था कि उसे सहन करना मुश्किल था, तब शिव ने उकीस जगह अपने आपको अरुणाचल पर्वत के रूप में प्रकट किया तथा उद्घोष किया कि “जिस प्रकार से चन्द्र्मा अपना प्रकाश सूर्य से प्राप्त करता है, उसी प्रकार से दूसरे पवित्र स्थल अपनी पवित्रता अरुणाचल से प्राप्त करेंगे | केवल यह स्थान है जहाँ उनके कल्याण के लिए मैने यह रूप धारण किया है जो मेरी पूजा करना एवं प्रकाशित होना चाहते हैं । अरुणाचल स्वयं में ओम है | मैं प्रतिवर्ष इस पर्वत के शिखर पर शान्ति देने वाले प्रकाश-ज्योति के रूप में प्रकट हूँगा” | यह न केवल अरुणाचल की पावनता का सन्दर्भ देता है बल्कि अद्वैत सिद्धान्त एवं आत्मविचार की महिमा का प्रदिपादन करता है, जिसका केन्द्र अरुणाचल है | भगवान के इस कथन से कोई उनका आशय जान सकता है कि ‘अन्त मे हर किसी को अरूणाचल आना होगा’ |

गिरि – प्रदक्षिणा:-

अरुणाचल – परिक्रमा को, जीवन के समस्त दु:खों से मुक्ति के लिए एक तप बताया गया है | महर्षि ने अपने सभी भक्तों को ९ मील (१४ कि.मी) की परिक्रमा के लिए प्रोत्साहित  किया | उन्होने कहा कि गिरि – प्रदक्षिणा की महिमा का विस्तार से वर्णन अरुणाचल पुराण में है| भगवान नंदीकेश ने सदाशिव से इसकी महानता के बारे में पूछा और सदाशिव ने उसका वर्णन इस प्रकार किया: ‘पर्वत की परिक्रमा उत्तम है | प्रदक्षिणा का विशिष्ट अर्थ है| ‘प्र’ अक्षर से सभी पापों से मुक्ति मिलती है | ‘द’ से सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है| ‘क्षि’ से आशय पुनर्जन्म से मुक्ति है| ‘णा’ से आशय ज्ञान के द्वारा मुक्ति है | ईश्वर का सतत स्मरण करते हुए परिक्रमा मौन या ध्यान, जप या भजन करते हुए करना चाहिए | परिक्रमा धीमी गति से उसी प्रकार करनी चाहिए जैसे एक गर्भवती स्त्री गर्भ के नवें माह में चलती है|

एक दूसरे अवसर पर इसके लाभों का वर्णन करते हुए महर्षि ने कहा, ‘वास्तव में इस प्रदक्षिणा से व्यक्ति जो प्रसन्नता एवं आनन्द प्राप्त करता है, उसका वर्णन करना मुश्किल है | शरीर थक जाता है, इन्द्रियों की शक्ति कम हो जाती है तथा शरीर की समस्त क्रियाएँ भीतर अवशोषित हो जाती हैं। इस प्रकार से अपने आपको भूलना संभव हो जाता है तथा ध्यान कि अवस्था प्राप्त हो जाती है । जैसे ही कोई चलना जारी रखता है तो शरीर आसन की अवस्था जैसे समरूप हो जाता है | इसलिए शरीर का स्वास्थ्य भी सुधरता है | इसके अतिरिक्त पर्वत पर अनेक जड़ी वूटियाँ हैं | औषधियों से गुजरी हुई हवा फेफड़ों के लिए अति उत्तम है |

‘ईश्वर के अतिरिक्त बिना विचार के परिक्रमा करने वाले यात्री अपनी आत्मा में लीन रह्ते हैं | शरीर हल्का हो जाता है तथा अपने आप चलता है | यह भी अनुभव नहीं होगा कि हम चल रहे हैं । आप बैठकर जिस ध्यान की प्रप्ति नहीं कर पाते वह स्वमेव प्रदक्षिण से प्राप्त कर लेते हैं | चलने में असमर्थ व्यक्ति भी एक बार परिक्रमा कर लेने के बाद बार-बार् परिक्रमा करने की इच्छा रखता है | जितना अधिक आप जाते, उतनी अधिक उत्सुकता बढ़‌ती जाती है, यह कभी कम नहीं होती | कोई व्यक्ति परिक्रमा के आनन्द से जुड़ जाने के बाद उसे कभी छोड़ नहीं सकता |

इन दिनो पूर्णिमा के अवसर पर लाखों यात्रियों को प्रदक्षिणा पर जाने का दृश्य देखा जा सकता है | उन भक्तों की संख्या भी अच्छी है जो नित्य परीक्रमा करते है | महर्षि अक्सर पर्वत की परिक्रमा में पूरा दिन, और कभी कभी कई दिन तथा कभी पूरा सप्ताह लेते थे | १९२६ में उसका अन्त हुआ जब उन्हें अनुभव हुआ कि प्रदक्षिणा के दौरान ध्यानाकर्षण से दूसरों को असुविधा होती है | किन्तु अपने आरंभिक भ्रमण के बारे में उन्होंने बताया कि पर्वत पर एक भी स्थान ऐसा नहीं है जहाँ उनके पैर नहीं पडे हों |

महर्षि द्वारा विरचित अरुणाचल पंचरत्न अत्यन्त भावपूर्ण उद्गार हैं जो एक पूर्ण ज्ञानी के आध्यात्मिक हृदय से निकलकर सदैव के लिए अरुणाचल के साथ एकाकार होते हैं | इन कविताओं की प्रत्येक पंक्ति में गहन प्रेरणा एवं मार्गदर्शन है|

“उसे एक स्वरूप मानकर जब मैने संपर्क किया तो वह पृथ्वी पर एक स्थिर पर्वत के रूप में खड़ा दिखता है | यदि मुमुक्षु अपने मन से उसकी आकृति को आकाररहित देखता है तो यह उसी प्रकार का है जैसे कोई पृथ्वी पर यात्रा करते हुए ईथर (आकाश) देखता है| इसके स्वरूप पर बिना विचार के ध्यान करने से स्वयं का व्यक्तित्व उसी प्रकार विगलित हो जाता है जैसे शक्कर की डली समुद्र के संपर्क में जाने से उसमें विलीन हो जाती है | जब मैने यह जानने का प्रयत्न किया कि ‘मैं कौन हूँ’ तथा मेरा कोई अलग अस्तित्व है तो मुझे उँचा अरुणाचल पर्वत खड़ा दीखा |

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